Wo kabhi dhoop kabhi chhanv lage

वो कभी धूप कभी छाँव लगे ।
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे ।

किसी पीपल के तले जा बैठे 
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे ।

एक रोटी के त’अक्कुब में चला हूँ इतना 
की मेरा पाँव किसी और ही का पाँव लगे । 

रोटि-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे ।

जैसे देहात में लू लगती है चरवाहों को
बम्बई में यूँ ही तारों की हँसी छाँव लगे ।

Kaifi azmi

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Yahi tohfa hai yahi nazrana

यही तोहफ़ा है यही नज़राना 
मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ
रंग में तेरे मिलाने के लिये
क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर लाया हूँ
ऐ गुलाबों के वतन

पहले कब आया हूँ कुछ याद नहीं
लेकिन आया था क़सम खाता हूँ
फूल तो फूल हैं काँटों पे तेरे
अपने होंटों के निशाँ पाता हूँ
मेरे ख़्वाबों के वतन

चूम लेने दे मुझे हाथ अपने
जिन से तोड़ी हैं कई ज़ंजीरे
तूने बदला है मशियत का मिज़ाज
तूने लिखी हैं नई तक़दीरें
इंक़लाबों के वतन

फूल के बाद नये फूल खिलें
कभी ख़ाली न हो दामन तेरा
रोशनी रोशनी तेरी राहें
चाँदनी चाँदनी आंगन तेरा
माहताबों के वतन

Kaifi azmi

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Waqt ne kiya kya hansi sitam

वक्त ने किया क्या हंसी सितम 
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम । 

बेक़रार दिल इस तरह मिले 
जिस तरह कभी हम जुदा न थे 
तुम भी खो गए, हम भी खो गए 
इक राह पर चल के दो कदम ।

जायेंगे कहाँ सूझता नहीं 
चल पड़े मगर रास्ता नहीं 
क्या तलाश है, कुछ पता नहीं 
बुन रहे क्यूँ ख़्वाब दम-ब-दम ।

Kaifi azmi

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Bas ek jhijhak hai

बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में 
कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में 

बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में 
वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में 

इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी 
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में 

ये कह के टूट पड़ा शाख़-ए-गुल से आख़िरी फूल 
अब और देर है कितनी बहार आने में 

Kaifi azmi

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पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए ।
हम चाँद से आज लौट आए ।

दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गया मेहरबान साए ।

जंगल की हवाएँ आ रही हैं
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए ।

लैला ने नया जन्म लिया है
है क़ैस  कोई जो दिल लगाए ।

है आज ज़मीं का गुस्ले-सेहत
जिस दिल में हो जितना ख़ून लाए ।

सहरा-सहरा लहू के ख़ेमे
फिए प्यासे लबे-फ़रात आए ।

Kaifi azmi

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Main yeh sochkar uske dar se ootha tha

मैं यह सोचकर उसके दर से उठा था
कि वह रोक लेगी मना लेगी मुझको ।

हवाओं में लहराता आता था दामन
कि दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको ।

क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे
कि आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको ।

कि उसने रोका न मुझको मनाया
न दामन ही पकड़ा न मुझको बिठाया ।

न आवाज़ ही दी न मुझको बुलाया
मैं आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ता ही आया ।

यहाँ तक कि उससे जुदा हो गया मैं
जुदा हो गया मैं, जुदा हो गया मैं ।

Kaifi azmi

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Jhuki jhuki se nazar bekarar hai ki nahi

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं 

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता 
मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं 

वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है 
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं 

तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को 
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं

Kaifi azmi

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Roz badhta hoon jahan se aage

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे 
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ 
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को 
इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ 
रोज़ बसते हैं कई शहर नये 
रोज़ धरती में समा जाते हैं 
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गिरह 
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं 

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत 
न कहीं धूप न साया न सराब 
कितने अरमाँ है किस सहरा में 
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब 
नफ़्ज़ बुझती भी भड़कती भी है 
दिल का मामूल है घबराना भी 
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा 
इक आदत है जिये जाना भी 

क़ौस एक रंग की होती है तुलू’अ 
एक ही चाल भी पैमाना भी 
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद 
मुश्किल क्या हो गई मयख़ाने की 
कोई कहता था समंदर हूँ मैं 
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं 
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ 
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं 

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ 
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह 
चंद रेखाओं में समाऊँ मैं 
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह 
राम कब लौटेंगे मालूम नहीं 
काश रावन ही कोई आ जाता 

Kaifi azmi

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Dastoor kya ye shahere sitamgar ke ho gaye

दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए ।
जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी
देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए ।

जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुला
टुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए ।

दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहा
इस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए ।

हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लें
हम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर  के हो गए ।

Kaifi azmi

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Tum pareshan na ho

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा

Kaifi azmi

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