Musafir

एक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया
कोई जल्दी में, कोई देर से जाने वाला

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Har ek baat pe kehte ho tum ki tu kya hai

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है 

Mirza Ghalib

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Sehar

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

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Mai unhe chedu aur kuch na kahe

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें 
चल निकलते, जो मय पिये होते 

क़हर हो, या बला हो, जो कुछ हो 
काश कि तुम मेरे लिये होते 

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था 
दिल भी, या रब, कई दिये होते 

आ ही जाता वो राह पर, “ग़ालिब” 
कोई दिन और भी जिये होते

Mirza Ghalib

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Jikr us parivash ka aur fir bayan apna

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना 
बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़दां अपना 

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में, यारब 
आज ही हुआ मंज़ूर उनको इम्तहां अपना 

मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते 
अर्श से उधर होता काश के मकां अपना 

दे वो जिस क़दर ज़िल्लत हम हँसी में टालेंगे 
बारे आशना निकला उनका पासबां अपना 

दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक, ज़ाऊँ उन को दिखला दूँ 
उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूंचकां अपना 

घिसते-घिसते मिट जाता आप ने अ़बस बदला 
नंग-ए-सिजदा से मेरे संग-ए-आस्तां अपना 

ता करे न ग़म्माज़ी, कर लिया है दुश्मन को 
दोस्त की शिकायत में हम ने हमज़बां अपना 

हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे 
बेसबब हुआ “ग़ालिब” दुश्मन आसमां अपना

Mirza Ghalib

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Ek ek katre ka mujhe dena pada hisaab

एक-एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ख़ून-ए-जिगर, वदीअ़त-ए-मिज़गान-ए-यार था

अब मैं हूँ और मातम-ए-यक-शहर-आरज़ू
तोड़ा जो तूने आईना तिमसाल-दार था

गलियों में मेरी नाश को खींचे फिरो कि मैं
जां-दादा-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार था

मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा का न पूछ हाल
हर ज़र्रा मिस्ल-ए-जौहर-ए-तेग़ आबदार था

कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब
देखा तो कम हुए पे ग़म-ए-रोज़गार था

किस का जुनून-ए-दीद तमन्ना-शिकार था
आईना-ख़ाना वादी-ए-जौहर-ग़ुबार था

किस का ख़याल आईना-ए-इन्तिज़ार था
हर बरग-ए-गुल के परदे में दिल बे-क़रार था

जूं ग़ुन्चा-ओ-गुल आफ़त-ए-फ़ाल-ए-नज़र न पूछ
पैकां से तेरे जलवा-ए-ज़ख़म आशकार था

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर
ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था

सुबह-ए-क़यामत एक दुम-ए-गुरग थी असद
जिस दश्त में वह शोख़-ए-दो-आ़लम शिकार था

Mirza Ghalib

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Ye na thi hamari kismat ke visaal-e-yaar hota

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता 
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता 

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना 
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता 

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अ़हद बोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को 
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता 

ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता 

रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता 
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता 

ग़म अगर्चे जां-गुसिल है, पर कहां बचे कि दिल है 
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता 

कहूँ किससे मैं कि क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है 
मुझे क्या बुरा था मरना? अगर एक बार होता 

हुए मर के हम जो रुस्वा, हुए क्यों न ग़र्क़-ए-दरिया 
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता 

उसे कौन देख सकता, कि यग़ाना है वो यकता
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता 

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान “ग़ालिब”! 
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता

Mirza Ghalib

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Dard minnat-kash-e-dawa na hua

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ

जमा करते हो क्यों रक़ीबों को?
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ

हम कहां क़िस्मत आज़माने जाएं?
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ

कितने शीरीं हैं तेरे लब! कि रक़ीब
गालियां खाके बे-मज़ा न हुआ

है ख़बर गर्म उनके आने की
आज ही घर में बोरिया न हुआ

क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बंदगी में मेरा भला न हुआ

जान दी, दी हुई उसी की थी
हक़ तो यूं है, कि हक़ अदा न हुआ

ज़ख़्म गर दब गया, लहू न थमा
काम गर रुक गया रवां न हुआ

रहज़नी है कि दिल-सितानी है?
लेके दिल दिलसितां रवाना हुआ

कुछ तो पढ़िये कि लोग कहते हैं
“आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़लसरा न हुआ”

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Aaina dekh apna sa muh leke reh gaye

आईना देख अपना सा मुंह लेके रह गये
साहिब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

क़ासिद को अपने हाथ से गरदन न मारिये
उस की ख़ता नहीं है यह मेरा क़सूर था

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Zor se baaz aaye par baaz aaye kya

ज़ौर से बाज़ आये पर बाज़ आयें क्या 
कहते हैं, हम तुम को मुँह दिखलायें क्या 

रात-दिन गर्दिश में हैं सात आस्मां 
हो रहेगा कुछ-न-कुछ घबरायें क्या 

लाग हो तो उस को हम समझें लगाव 
जब न हो कुछ भी, तो धोखा खायें क्या 

हो लिये क्यों नामाबर के साथ-साथ 
या रब! अपने ख़त को हम पहुँचायें क्या 

मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यों न जाये 
आस्तान-ए-यार से उठ जायें क्या 

उम्र भर देखा किये मरने की राह 
मर गए पर देखिये दिखलायें क्या 

पूछते हैं वो कि “ग़ालिब” कौन है 
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या

Mirza Ghalib

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