Mar ke bhi kab tak nigaahe shauk ko ruswa karen

मर के भी कब तक निगाहे-शौक़ को रुस्वा करें
ज़िन्दगी तुझको कहाँ फेंक आएँ आख़िर क्या करें

ज़ख़्मे-दिल मुम्किन नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें
वो हमें देखें न देखें हम उन्हें देखा करें

Jigar moradabadi

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Muhabbat mein kya kya mukam aa rahe hai

मोहब्बत में क्या-क्या मुक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं

ये कह-कह के हम दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं

वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं
ख़ुदा जाने क्या ख़याल आ रहे हैं

हमारे ही दिल से मज़े उनके पूछो
वो धोके जो दानिस्ता हम खा रहे हैं

जफ़ा करने वालों को क्या हो गया है
वफ़ा करके हम भी तो शरमा रहे हैं

वो आलम है अब यारो-अग़ियार कैसे
हमीं अपने दुश्मन हुए जा रहे हैं

मिज़ाजे-गिरामी की हो ख़ैर यारब
कई दिन से अक्सर वो याद आ रहे हैं

Jigar moradabadi

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Na jan dil banegi na dil jaan hoga

न जाँ दिल बनेगी न दिल जान होगा
ग़मे-इश्क़ ख़ुद अपना उन्वान होगा

ठहर ऐ दिले-दर्दमंदे-मोहब्बत
तसव्वुर किसी का परेशान होगा

मेरे दिल में भी इक वो सूरत है पिन्हाँ
जहाँ हम रहेंगे ये सामान होगा

गवारा नहीं जान देकर भी दिल को
तिरी इक नज़र का जो नुक़सान हेगा

चलो देख आएँ `जिगर’ का तमाशा
सुना है वो क़ाफ़िर मुसलमान होगा

Jigar moradabadi

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Zarron se baate karte hai diwarodar se ham

ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम।
मायूस किस क़दर है, तेरी रहगुज़र से हम॥

कोई हसीं हसीं ही ठहरता नहीं ‘जिगर’।
बाज़ आये इस बुलन्दिये-ज़ौक़े-नज़र से हम॥

इतनी-सी बात पर है बस इक जंगेज़रगरी।
पहले उधर से बढ़ते हैं वो या इधर से हम॥

Jigar moradabadi

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Agar na zohra jabino ke darmiyan guzre

अगर न ज़ोहरा जबीनों के दरमियाँ गुज़रे 
तो फिर ये कैसे कटे ज़िन्दगी कहाँ गुज़रे 

जो तेरे आरिज़-ओ-गेसू के दरमियाँ गुज़रे 
कभी-कभी तो वो लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे 

मुझे ये वहम रहा मुद्दतों के जुर्रत-ए-शौक़ 
कहीं ना ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे 

हर इक मुक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिल-कश था 
मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ-कशाँ गुज़रे 

जुनूँ के सख़्त मराहिल भी तेरी याद के साथ 
हसीं-हसीं नज़र आये जवाँ-जवाँ गुज़रे 

मेरी नज़र से तेरी जुस्तजू के सदक़े में 
ये इक जहाँ ही नहीं सैकड़ों जहाँ गुज़रे 

हजूम-ए-जल्वा में परवाज़-ए-शौक़ क्या कहना 
के जैसे रूह सितारों के दरमियाँ गुज़रे 

ख़ता मु’आफ़ ज़माने से बदगुमाँ होकर 
तेरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे 

ख़ुलूस जिस में हो शामिल वो दौर-ए-इश्क़-ओ-हवस 
नारैगाँ कभी गुज़रा न रैगाँ गुज़रे 

इसी को कहते हैं जन्नत इसी को दोज़ख़ भी 
वो ज़िन्दगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे 

बहुत हसीन सही सुहबतें गुलों की मगर 
वो ज़िन्दगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे 

मुझे था शिक्वा-ए-हिज्राँ कि ये हुआ महसूस 
मेरे क़रीब से होकर वो नागहाँ गुज़रे 

बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के 
न जाने आज तबीयत पे क्यों गिराँ गुज़रे 

मेरा तो फ़र्ज़ चमन बंदी-ए-जहाँ है फ़क़त 
मेरी बला से बहार आये या ख़िज़ाँ गुज़रे 

कहाँ का हुस्न कि ख़ुद इश्क़ को ख़बर न हुई 
राह-ए-तलब में कुछ ऐसे भी इम्तहाँ गुज़रे 

भरी बहार में ताराजी-ए-चमन मत पूछ 
ख़ुदा करे न फिर आँखों से वो समाँ गुज़रे 

कोई न देख सका जिनको दो दिलों के सिवा 
मु’आमलात कुछ ऐसे भी दरमियाँ गुज़रे 

कभी-कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द 
तवाफ़ करते हुये हफ़्त आस्माँ गुज़रे 

बहुत अज़ीज़ है मुझको उन्हीं की याद “जिगर” 
वो हादसात-ए-मोहब्बत जो नागहाँ गुज़रे

Jigar moradabadi

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Tujhi se ibtda hai

तुझी से इब्तदा है तू ही इक दिन इंतहा होगा 
सदा-ए-साज़ होगी और न साज़-ए-बेसदा होगा 

हमें मालूम है हम से सुनो महशर में क्या होगा 
सब उस को देखते होंगे वो हमको देखता होगा 

सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा 
दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा 

जहन्नुम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा 
ये क्या कम है हमारा और उस का सामना होगा 

निगाह-ए-क़हर पर ही जान-ओ-दिल सब खोये बैठा है 
निगाह-ए-मेहर आशिक़ पर अगर होगी तो क्या होगा 

ये माना भेज देगा हम को महशर से जहन्नुम में 
मगर जो दिल पे गुज़रेगी वो दिल ही जानता होगा 

समझता क्या है तू दीवानगी-ए-इश्क़ को ज़ाहिद 
ये हो जायेंगे जिस जानिब उसी जानिबख़ुदा होगा 

“ज़िगर” का हाथ होगा हश्र में और दामन-ए-हज़रत 
शिकायत हो कि शिकवा जो भी होगा बरमला होगा

Jigar moradabadi

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Barabar se bachkar guzar jaane wale

बराबर से बचकर गुज़र जाने वाले 
ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले 

मुहब्बत में हम तो जिये हैं जियेंगे 
वो होंगे कोई और मर जाने वाले 

मेरे दिल की बेताबियाँ भी लिये जा 
दबे पाओं मूँह फेर के जाने वाले 

नहीं जानते कुछ कि जाना कहाँ है 
चले जा रहे हैं मगर जाने वाले 

तेरे इक इशारे पे साकित खड़े हैं 
नहीं कह के सब से गुज़र जाने वाले

Jigar moradabadi

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Os pade bahar par aag lage kanar mein

ओस पदे बहार पर आग लगे कनार में 
तुम जो नहीं कनार में लुत्फ़ ही क्या बहार में 

उस पे करे ख़ुदा रहम गर्दिश-ए-रोज़गार में 
अपनी तलाश छोड़कर जो है तलाश-ए-यार में 

हम कहीं जानेवाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर 
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में

Jigar moradabadi

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Saki par ilzaam na aaye

साक़ी पर इल्ज़ाम न आये 
चाहे तुझ तक जाम न आये 

तेरे सिवा जो की हो मुहब्बत 
मेरी जवानी काम न आये 

जिन के लिये मर भी गये हम 
वो चल कर दो गाम न आये 

इश्क़ का सौदा इतना गराँ है 
इन्हें हम से काम न आये 

मयख़ाने में सब ही तो आये 
लेकिन “ज़िगर” का नाम न आये

Jigar moradabadi

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Dil ko jab dil se rah hoti hai

दिल को जब दिल से राह होती है
आह होती है वाह होती है

इक नज़र दिल की सिम्त देख तो लो
कैसे दुनिया तबाह होती है

हुस्न-ए-जानाँ की मन्ज़िलों को न पूछ
हर नफ़स एक राह होती है

क्या ख़बर थी कि इश्क़ के हाथों
ऐसी हालत तबाह होती है

साँस लेता हूँ दम उलझता है
बात करता हूँ आह होती है

जो उलट देती है सफ़ों के सफ़े
इक शिकस्ता-सी आह होती है

Jigar moradabadi

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