रिश्ते काँच सरीख़े …

रिश्ते काँच सरीख़े हैं, टूट कर बिखर ही जाते हैं…
समेटने की ज़हमत कौन करे, लोग काँच ही नया ले आते हैं…!
.
SHoaiB

रिश्ते काँच सरीख़े हैं, टूट कर बिखर ही जाते हैं…
समेटने की ज़हमत कौन करे, लोग काँच ही नया ले आते हैं…!
.
SHoaiB

Posted by | View Post | View Group