चलो ये इश्क़ नहीं …

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है..
कि क्या करें हमें दूसरे की आदत है!!

तू अपनी शीशागरी का हुनर न कर ज़ाया..
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है!!

मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है

तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी..
न वो सख़ी न तुझे माँगने की आदत है!!

विसाल में भी वो ही है फ़िराक़ का आलम..
कि उसको नींद मुझे रतजगे की आदत है!!

ये ख़ुद अज़ियती कब तक “फ़राज़” तू भी उसे..
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है!!
#AhmedFaraz

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है..
कि क्या करें हमें दूसरे की आदत है!!

तू अपनी शीशागरी का हुनर न कर ज़ाया..
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है!!

मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है

तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी..
न वो सख़ी न तुझे माँगने की आदत है!!

विसाल में भी वो ही है फ़िराक़ का आलम..
कि उसको नींद मुझे रतजगे की आदत है!!

ये ख़ुद अज़ियती कब तक “फ़राज़” तू भी उसे..
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है!!
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