Jalta hoon hizr e shahid o yad e sharaab mein

जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद-ओ-याद-ए-शराब में| 

शौक़-ए-सवाब ने मुझे डाला अज़ाब में|
 
कहते हैं तुम को होश नहीं इज़्तराब में, 
सारे गिले तमाम हुए एक जवाब में| 

फैली शमीम-ए-यार मेरे अश्क-ए-सुर्ख़ से, 
दिल को ग़ज़ब फ़िशार हुआ पेच-ओ-ताब में| 

रहते हैं जमा कूचा-ए-जानाँ में ख़ास-ओ-आम, 
आबाद एक घर है जहान-ए-ख़राब में| 

बदनाम मेरे गिरिया-ए-रुसवा से हो चुके, 
अब उज़्र क्या रहा निगाह-ए-बेहिजाब में| 

मतलब की जुस्तजू ने ये क्या हाल कर दिया, 
हसरत भी नहीं दिल-ए-नाकामयाब में| 

नाकामियों से काम रहा उम्र भर हमें, 
पिरी में यास है जो हवस थी शबाब में| 

क्या जलवे याद आये के अपनी ख़बर नहीं, 
बे-बादा मस्त हूँ मैं शब-ए-माहताब में| 

पैहम सजूद पा-ए-सनम पर दम-ए-विदा, 
“मोमिन” ख़ुदा को भूल गये इज़्तराब में| 

Momin khan momin

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Author: admin

I just love Shayri

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