Shab e gham e furkat hamein Kya Kya maze dikhlaye tha

शब-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त हमें क्या क्या मज़े दिखलाए था| 

दम रुके था सीने में कम्बख़्त जी घबराए था| 

बल बे अय्यारी अदू के आगे वो पैमान शिकन, 
वादा-ए-वस्ल फिर करता था और शर्माए था| 

सुन के मेरी मर्ग बोले मर गया अच्छा हुआ, 
क्या बुरा लगता था जिस दम सामने आ जाए था| 

बात शब को उस के मना-ए-बेक़रारी से बड़ी, 
हम तो समझे और कुछ वो और कुछ समझाए था| 

कोई दिन तो उस पे क्या तस्वीर का आलम रहा, 
हर कोई हैरत का पुतला देख कर बन जाए था| 

सू-ए-सहरा ले चले उस कू से मेरी नाश हाए, 
था यही दर इन दिनों तलवा मेरा खुजलाए था| 

हो गई दो रोज़ की उल्फ़त में क्या हालत अभी, 
“मोमिन”-ए-वहशी को देखा इस तरफ़ से जाए था| 

Momin khan momin

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Author: admin

I just love Shayri

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