Is kadar musalsal thi shiddte judai ki

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की 

आज पहली बार उससे मैनें बेवफ़ाई की 

वरना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में 
या तो टूट कर रोया या ग़ज़लसराई की 

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में 
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की 

हो चला था जब मुझको इख़्तिलाफ़ अपने से 
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की 

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर हैं नासेह के 
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की 

फिर क़फ़स में शोर उठा क़ैदियों का और सय्याद 
देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की

Ahmed Faraz

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Author: admin

I just love Shayri

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