Subha ki aas kisi lamhe jo ghat jaati hai

सुबह की आस किसी लम्हे जो घट जाती है 
ज़िन्दगी सहम के ख़्वाबों से लिपट जाती है 

शाम ढलते ही तेरा दर्द चमक उठता है 
तीरगी दूर तलक रात की छट जाती है 

बर्फ़ सीनों की न पिघले तो यही रूद-ए-हयात 
जू-ए-कम-आब की मानिंद सिमट जाती है 

आहटें कौन सी ख़्वाबों में बसी है जाने 
आज भी रात गये नींद उचट जाती है 

हाँ ख़बर-दार कि इक लग़्ज़िश-ए-पा से भी कभी 
सारी तारीख़ की रफ़्तार पलट जाती है

Jaan nissar akhtar

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