Mar ke bhi kab tak nigaahe shauk ko ruswa karen

मर के भी कब तक निगाहे-शौक़ को रुस्वा करें
ज़िन्दगी तुझको कहाँ फेंक आएँ आख़िर क्या करें

ज़ख़्मे-दिल मुम्किन नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें
वो हमें देखें न देखें हम उन्हें देखा करें

Jigar moradabadi

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