Gagan tak maar karna aa gaya hai

गगन तक मार करना आ गया है, 
समय पर वार करना आ गया है । 

उन्हें……कविता में बौनी वेदना को, 
कुतुब-मीनार करना आ गया है ! 

धुएँ की स्याह चादर चीरते ही, 
घुटन को पार करना आ गया है । 

अनैतिक व्यक्ति के अन्याय का अब, 
हमें प्रतिकार करना आ गया है । 

खुले बाजार में विष बेचने को, 
कपट व्यवहार करना आ गया है । 

हम अब जितने भी सपने देखते हैं, 
उन्हें साकार करना आ गया है । 

शिला छूते ही, नारी बन गई जो, 
उसे अभिसार करना आ गया है

Zaheer quraishi

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Author: admin

I just love Shayri

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